
देश में विरोध प्रदर्शनों का बदलता स्वरूप और संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव की राजनीति
दैनिक शुभ भास्कर श्रीमती हंसा देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक अनोखा और हाई-टेक प्रदर्शन देखने को मिला है। इसे ‘देश का पहला कैमरे वाला और रील्स वाला प्रोटेस्ट’ करार दिया। विश्लेषण के मुताबिक, जंतर-मंतर और लुटियंस दिल्ली के आसपास विपक्षी दलों मुख्य रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और उनके सहयोगी दलों के इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य धरातल से ज़्यादा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूदगी दर्ज कराना था।
रील्स वाली राजनीति आंदोलन का एक बड़ा हिस्सा असल में सिर्फ डिजिटल सामग्री तैयार करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। आईटी सेल और पार्टी कार्यकर्ताओं के कैमरे दिन भर एक्टिव रहे, जिनका एकमात्र फोकस सिर्फ एक या दो प्रमुख चेहरों को चमकाना था, जबकि विपक्षी गठबंधन के अन्य बड़े नेता जैसे अखिलेश यादव या सुप्रिया सुले भीड़ में सिर्फ ‘एक्स्ट्रा’ की भूमिका में नजर आए।
दिल्ली पुलिस की चौकसी: कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए दिल्ली पुलिस ने कड़े इंतजाम किए, बैरिकेडिंग की और कुछ संदिग्ध प्रदर्शनों जैसे तथाकथित ‘कॉकरोच पार्टी’ का विरोध मार्च को निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुमति न मिलने के कारण रोक दिया।
न्यायपालिका पर दबाव: केरल कांग्रेस का विवादित कदम और CJI से इस्तीफा मांगने की ज़िद इस अभियान और आंदोलन का सबसे विवादित मोड़ तब आया, जब न्यायपालिका को सीधे तौर पर राजनीतिक घमासान में घसीटने की कोशिश की गई। दिल्ली में चुनाव आयोग के अधिकारियों के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की थी कि कानून-व्यवस्था संभालना कोर्ट के नहीं बल्कि कार्यपालिका और पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है।
“डियर सूर्यकांत. इस्तीफा दे दीजिए”: सीजेआई के इस बयान के तुरंत बाद केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आधिकारिक हैंडल से एक बेहद आक्रामक और तीखा पोस्ट साझा किया गया, जिसमें सीजेआई सूर्यकांत को सीधे तौर पर ‘डियर सूर्यकांत’ संबोधित करते हुए पद छोड़ने की मांग कर दी गई।
अहंकार और सफाई का विश्लेषण: शो में सुधीर चौधरी ने इस पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे देश की सर्वोच्च अदालत का अपमान और ‘ताकत का घमंड’ बताया। विवाद बढ़ने और चौतरफा घिरने के बाद केरल कांग्रेस ने यह कहते हुए पोस्ट डिलीट कर दिया कि यह शीर्ष नेतृत्व की जानकारी के बिना किसी कार्यकर्ता द्वारा किया गया था, और उस कार्यकर्ता को पद से हटा दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को आपस में लड़ाने की बड़ी रणनीति
देश के भीतर कुछ ताकतें और राजनीतिक दल एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रहे हैं, जिसका मकसद सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं को आपस में टकराव की स्थिति में खड़ा करना है।
विपक्ष लगातार ईवीएम वोटर लिस्ट और चुनाव अधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर सवाल उठा रहा है। वे चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के हर प्रशासनिक फैसले में हस्तक्षेप करे। जब देश की सर्वोच्च अदालत संवैधानिक सीमाओं का हवाला देकर कार्यपालिका के कामों में दखल देने से मना करती है, तो न्यायपालिका के खिलाफ ही कैंपेन शुरू कर दिया जाता है। टूलकिट विदेशी फंडिंग का कनेक्शन
एनालिसिस में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे के बयानों का भी हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने आशंका जताई है कि भारत के भीतर होने वाले कई बड़े विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी ताकतें काम कर रही हैं, जिनका मकसद भारत की लोकतांत्रिक स्थिरता को चोट पहुंचाना और आंतरिक माहौल को अशांत रखना है। साल 2014 के बाद से लगातार एक ही पैटर्न पर चल रहे विरोध प्रदर्शन जैसे किसान आंदोलन, सीएए विरोध और अब जंतर-मंतर मार्च कहीं न कहीं एक बड़ी वैश्विक टूलकिट का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
आज के दौर में राजनीति सिर्फ जमीन पर हक की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह रील्स और सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव सेट करने का हाई-टेक जरिया बन चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए देश की सर्वोच्च न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी शीर्ष संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सुनियोजित चोट की जा रही है, जिससे हर देशवासी को सतर्क रहने की आवश्यकता है।











