
UGC नियमों से स्टूडेंट लाइफ में जातीय वर्गीकरण को बढ़ावा?
राष्ट्रीयता, सनातन और हिंदुत्व पर प्रहार है या नहीं—सवाल यह भी, जवाब कौन देगा?
नागपाल शर्मा माचाडी की रिपोर्ट
(माचाडीअलवर):-अलवर- UGC के नए प्रावधानों को लेकर एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों की सुरक्षा और भेदभाव रोकने के नाम पर ऐसे प्रावधान किए जा रहे हैं, जो छात्र जीवन की शुरुआत से ही समाज को जातीय खांचों में बांटने का काम करेंगे?
सवाल यह नहीं है कि किसी भी विद्यार्थी के साथ जाति, धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव होना चाहिए या नहीं। भेदभाव किसी भी रूप में नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि समानता स्थापित करने के नाम पर ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें किसी एक सामाजिक वर्ग के विद्यार्थियों को पहले से ही संदेह की निगाह से देखा जाने लगे,तो क्या यह वास्तविक समानता होगी?
यहीं से “है और नहीं कैसे?” का प्रश्न सामने आता है।
यदि कानून का उद्देश्य हर विद्यार्थी को समान सुरक्षा देना है, तो वह किसी भी जाति के विद्यार्थी के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि किसी व्यवस्था में शिकायत मात्र के आधार पर कार्यवाही की आशंका हो, जांच और निष्पक्ष प्रक्रिया बाद में आए तथा किसी वर्ग को लगातार अपराधी या उत्पीड़क की संभावित भूमिका में देखा जाए,तो स्वाभाविक रूप से उस वर्ग के भीतर असुरक्षा और असंतोष पैदा होगा।
सवर्ण समाज के हिस्से में क्या है?
आज एक बड़ा वर्ग यह सवाल पूछ रहा है कि सामाजिक न्याय की नीतियों पर लगातार विचार और विमर्श हो रहा है, लेकिन सवर्ण समाज की सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर गंभीर मंथन आखिर कौन कर रहा है? आरक्षण व्यवस्था से लेकर विभिन्न कानूनों और नीतियों तक—समानता का सवाल केवल वंचित वर्गों के अधिकारों तक सीमित नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में समानता का अर्थ हर नागरिक के अधिकारों और सुरक्षा की समान गारंटी भी है। क्या ऐसी कोई व्यापक नीति है जो आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण परिवारों, उनके बच्चों,विद्यार्थियों और युवाओं की समस्याओं को केंद्र में रखकर बनाई गई हो? क्या कभी इस बात पर गंभीर राष्ट्रीय बहस हुई कि जाति की पहचान को लगातार संस्थागत व्यवस्था में दर्ज कराने से आने वाली पीढ़ियों के मन में जातीय पहचान और मजबूत होगी या कमजोर?
*जन्म से कोई अपराधी नहीं होता*
सबसे गंभीर सवाल विद्यार्थियों को लेकर है।
किसी भी बच्चे को उसकी जाति,परिवार या जन्म के आधार पर अपराधी नहीं माना जा सकता। किसी विद्यार्थी के खिलाफ शिकायत हो तो निष्पक्ष जांच हो,दोष सिद्ध होने पर कार्यवाही हो और निर्दोष को सुरक्षा मिले—यही कानून के शासन का मूल सिद्धांत होना चाहिए।
इसलिए सवाल किसी वर्ग को विशेष संरक्षण देने का नहीं, बल्कि निष्पक्ष प्रक्रिया और समान अधिकार सुनिश्चित करने का है।
यदि किसी विद्यार्थी के साथ वास्तव में भेदभाव या उत्पीड़न होता है तो उसके खिलाफ कठोर कार्यवाही होनी ही चाहिए। लेकिन उसी व्यवस्था में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से निर्दोष विद्यार्थियों की रक्षा का मजबूत प्रावधान भी उतना ही जरूरी है।
*सनातन और हिंदुत्व का सवाल*
यह कहना कि कोई एक UGC नियम सीधे तौर पर “सनातन या हिंदुत्व पर प्रहार” है, एक राजनीतिक और वैचारिक निष्कर्ष हो सकता है; इसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले नियमों के वास्तविक प्रावधानों को देखना जरूरी है।
लेकिन दूसरी ओर यह सवाल उठाना पूरी तरह लोकतांत्रिक है कि क्या जातीय पहचान को बार-बार संस्थागत रूप से सामने लाने से समाज जाति-मुक्त होगा या जातीय पहचान और गहरी होगी?
सनातन की मूल भावना यदि समरसता,सह-अस्तित्व और मानव गरिमा है,तो किसी भी प्रकार का भेदभाव उसके मूल विचार के अनुरूप नहीं हो सकता। इसी तरह हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वालों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि वे केवल सांस्कृतिक और धार्मिक नारों तक सीमित रहेंगे या समान नागरिक अधिकारों, सामाजिक समरसता और निष्पक्ष कानून के सवाल पर भी स्पष्ट नीति रखेंगे?
*सवाल सिर्फ सवर्ण समाज का नहीं, व्यवस्था की निष्पक्षता का है*
आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल और सरकारें हर समाज के लिए सोचें। किसी वर्ग के अधिकारों की रक्षा दूसरे वर्ग के अधिकारों को कमजोर करके नहीं होनी चाहिए।
सामाजिक न्याय का अर्थ किसी के साथ अन्याय नहीं हो सकता।
यदि कमजोर वर्गों के लिए योजनाएं और सुरक्षा कानून जरूरी हैं तो आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण परिवारों, उनके विद्यार्थियों और युवाओं के लिए भी समान अवसर सुनिश्चित करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
सवाल यह नहीं कि किस जाति को कितना मिला।
सवाल यह होना चाहिए कि क्या हर नागरिक को समान सम्मान,समान अवसर और निष्पक्ष कानून मिला?
और अंत में सबसे बड़ा सवाल—
जो लोग सनातन और हिंदुत्व! को मजबूत करने की बात करते हैं, क्या वे केवल झंडा मजबूत कर रहे हैं, या उस समाज को भी मजबूत करने की कोई ठोस नीति बना रहे हैं जो उनके साथ खड़ा है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि समाज से समर्थन लिया जा रहा है, लेकिन समाज की वास्तविक समस्याओं पर विचार करने का समय किसी के पास नहीं है?
समानता चाहिए तो कानून भी समान दृष्टि वाला होना चाहिए—न किसी के पक्ष में, न किसी के खिलाफ।











