
कथाकथित सीजेबी पार्टी और पत्रकारिकताओं की आड़
नागरिक सक्रियता और पत्रकारिता की निष्पक्षता: CJP के संदर्भ में एक विमर्श
सुनील कुमार मिश्रा दैनिक शुभ भास्कर आज के आधुनिक दौर में हर आदमी के पास मोबाइल और कैमरे होते हैं इसी की आड़ में सीजेपी पार्टी के कार्यकर्ता अपने आप को पत्रकार बना रहे बता रहे हैं
भारतीय संस्थानों पर हमला कर रहे हैं पुलिस सेना को गालियां दे रहे हैं उन पर हमला कर रहे हैं सरकारी कार्य में बाधा डाल रहे हैं देश के प्रधानमंत्री गृहमंत्री असंभव भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं अपने आप को पत्रकार बता रहे हैं सच्ची पत्रकारिता का उद्देश्य बिना किसी पूर्वाग्रह के तथ्यों को सामने रखना है। लेकिन वर्तमान दौर में पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता के मानवाधिकारों और कानूनी लड़ाई का दावा करता है, लेकिन आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग यह आरोप लगाता रहा है कि इस संगठन और इसके कार्यकर्ताओं के तौर-तरीकों ने निष्पक्ष खोजी पत्रकारिता और अदालती प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का काम किया है।
1. एजेंडा-आधारित नैरेटिव और पत्रकारिता का इस्तेमाल
आलोचकों का तर्क है कि सीजेपी और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं ने मानवाधिकारों की आड़ में एक खास तरह का राजनीतिक और वैचारिक एजेंडा चलाया है। पत्रकारिता का मूल नियम दोनों पक्षों की बात सुनना है, लेकिन आरोप है कि सीजेपी के कार्यकर्ताओं ने मीडिया और ग्राउंड रिपोर्टिंग का इस्तेमाल केवल एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए किया। जब पत्रकारिता का उपयोग किसी खास समूह या व्यक्ति को कानूनी और सामाजिक रूप से घेरने के लिए एक उपकरण के रूप में किया जाने लगता है, तो इससे मीडिया की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता दोनों पर बट्टा लगता है।
2. अदालती मामलों और गवाहों के साथ छेड़छाड़ के आरोप
सीजेपी के कार्यकर्ताओं पर सबसे गंभीर आरोप गुजरात दंगों के मामलों की कानूनी लड़ाइयों के दौरान लगे। देश की शीर्ष अदालतों और जांच एजेंसियों की कार्यवाहियों के दौरान यह बात सामने आई कि संगठन के कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों और गवाहों के बयानों को खुद तैयार किया और उन्हें मीडिया में सनसनीखेज तरीके से उछाला। आलोचकों के अनुसार, मीडिया में झूठी या बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई कहानियों को प्लांट करना और बाद में उन्हें सच साबित करने की कोशिश करना सीधे तौर पर जिम्मेदार पत्रकारिता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
3. सोशल मीडिया पर चुनिंदा आक्रोश
डिजिटल मीडिया के इस दौर में सीजेपी के कार्यकर्ता विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काफी सक्रिय हैं। उन पर अक्सर यह आरोप लगता है कि उनका आक्रोश ‘चुनिंदा’ होता है। देश में जब भी अभिव्यक्ति की आजादी या मानवाधिकारों का मुद्दा उठता है, तो यह संगठन केवल उन मामलों को प्रमुखता से उठाता है जो उनके वैचारिक विरोधियों जैसे मौजूदा सरकार या बहुसंख्यक समाज को कटघरे में खड़ा करते हैं। इसके विपरीत, अन्य राज्यों या विपरीत विचारधारा वाली सरकारों के कार्यकाल में होने वाले मानवाधिकार हननों पर इनकी चुप्पी पत्रकारिता और सक्रियता दोनों के दोहरे मापदंडों को उजागर करती है।
4. विदेशी फंडिंग और साख पर सवाल
सीजेपी और इसके प्रमुखों पर वित्तीय अनियमितताओं और विदेशी फंडिंग नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप लगे हैं। गृह मंत्रालय और जांच एजेंसियों के अनुसार, मानवाधिकारों और कानूनी मदद के नाम पर जुटाए गए धन का उपयोग व्यक्तिगत हितों और एक खास प्रोपेगैंडा को हवा देने के लिए किया गया। जब कोई संगठन वित्तीय रूप से संदिग्ध हो जाता है, तो उसके द्वारा समर्थित मीडिया रिपोर्ट्स और उनके कार्यकर्ताओं द्वारा किए जाने वाले दावों की साख भी आम जनता की नजरों में गिर जाती है।
संगठन का पक्ष और दूसरा दृष्टिकोण
इसके विपरीत, सीजेपी और उनके समर्थकों का कहना है कि वे केवल हाशिए पर पड़े लोगों, अल्पसंख्यकों और दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम कर रहे हैं। उनका तर्क है कि शक्तिशाली ताकतों और सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें और उनके कार्यकर्ताओं को जानबूझकर निशाना बनाया जाता है और उनके काम को ‘प्रोपेगैंडा’ कहकर बदनाम किया जाता है। समर्थकों के अनुसार, उनका काम खोजी पत्रकारिता को मजबूत करना और दबी हुई आवाजों को मुख्यधारा के मीडिया में जगह दिलाना है।
निष्कर्ष
नागरिक अधिकारों की रक्षा किसी भी लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन जब सामाजिक संगठन और उनके कार्यकर्ता न्याय प्रणाली और मीडिया रिपोर्टिंग को अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से मोड़ने का प्रयास करते हैं, तो इससे पत्रकारिता की गरिमा को भारी ठेस पहुंचती है। पत्रकारिता को किसी भी प्रकार के नैरेटिव- बिल्डिंग या व्यक्तिगत एजेंडे से दूर रहना चाहिए। यदि कार्यकर्ता तथ्यों के बजाय धारणाओं के आधार पर मीडिया का इस्तेमाल करेंगे, तो इससे अंततः समाज का स्वतंत्र पत्रकारिता पर से भरोसा उठ जाएगा।











