
जटिल जीवन का महा वृत्तांत है ‘आधा गांव’: डॉ. आशीष त्रिपाठी
वाराणसी l 2,नवम्बर,मऊ
डॉ. राही मासूम रज़ा जन्म शताब्दी स्मरण का आयोजन प्रलेस जलेस जसम और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ सभागार मऊ’ में किया गया इस अवसर पर ‘घर गांव और राष्ट्रवाद विषय पर संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया संगोष्ठी की शुरुआत आंचल और जाह्नवी के जनवादी गीत से हुई मुख्य वक्तव्य देते हुए आलोचक डॉ. आशीष त्रिपाठी ने कहा कि राही मासूम रज़ा का आधा गांव जटिल जीवन का महा वृत्तांत है उपन्यास की शुरुआत ही एक नकारात्मक बिम्ब से होती है और पूरा उपन्यास ही उदासी के विवरणों से भरा हुआ है बार-बार मोहर्रम का ज़िक्र आना इसी की तरफ इशारा है यह उपन्यास एक शोक गीत है इसे सिर्फ हिन्दू मुसलमान के बीच हुए मतभेद के दृष्टिकोण से देखना इसका सरलीकरण करना है इस उपन्यास को समूची सांस्कृतिक विरासत के ढह जाने के दृष्टिकोण से पढ़ा जाना चाहिए। राही मासूम रज़ा ने भाषा घर गांव, देश सभी विभाजनों पर सवाल उठाया है और उन पर बात की है। उपन्यास में जिस साझी विरासत और एका की बात बार-बार की जा रही है वह अंततः जातिगत है फ्यूडल एलीट की विरासत है इसका आलोचनात्मक पाठ राही करते हैं लेखक संगठनों को भी राही की तरह अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलनों की एक सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए जैसे उन्होंने आधा गांव’ में शिया मुसलमानों की सच्ची तस्वीर पेश की आधार वक्तव्य देते हुए नलिन रंजन सिंह ने कहा कि राही मासूम रजा ने विभाजन को एक भयावह त्रासदी की तरह अपने उपन्यासों में अंकित किया लेकिन आज का निजाम विभाजन की राह पर चल रहा है यदि हिंदी और उर्दू को अलग-अलग धर्म की भाषा के रूप में देखा जा रहा है तो वह देखा जाना बंद होना चाहिए हिंदी और उर्दू चेहरे की दो आंखें हैं यदि एक आंख खराब होगी तो चेहरा बदसूरत दिखेगा राही मासूम रजा मोहब्बत को अहमियत देने वाले थे। गंगा का जल उनकी रग रग में दौड़ता था डॉ. गोपाल प्रधान ने कहा कि साहित्य की यह ताकत होती है कि कुछ शब्द जेहन में छोड़ जाती है जिसे हम ताउम्र ढोते रहते हैं राही जी के उपन्यासों में विभाजन की त्रासदी भयावह है अंतरिक्ष से चीन की दीवार दिखाई दे या ना दे लेकिन पार्टीशन की दीवार जरूर दिखाई देती है नए भारत की तामीर करना हो तो दिलों के पार्टीशन को दूर करना होगा डॉ बसंत त्रिपाठी ने कहा कि विभाजन के बाद की विभीषिका का धब्बा सबसे अधिक भारतीय मुसलमानों पर मढ़ा जाता है। राही न उर्दू के पक्षधर थे न ही हिंदी के इसके बावजूद राही जैसे बड़े लेखक को बार-बार अपनी निष्ठा प्रमाणित करनी पड़ती है राही कहते हैं कि पाकिस्तान में गंगौली नहीं है तो मुझे पाकिस्तान जाने की आवश्यकता नहीं है डॉ प्रभाकर सिंह ने कहा कि राही मासूम रजा इतिहास में हाशिए पर डाले गए समाज की आवाज बन गए हैं हिंदू मिथकों पर राही की दृष्टि बहुत व्यापक है वे कहते हैं कि मुझे शिव के रौद्र रूप से प्रेम नहीं अपितु नटराज रूप से प्रेम है राही की भाषा संवाद करती हुई भाषा है राही का समाज एक रेखीय नहीं बहुरेखीय समाज है वो ग्रामीण समाज के साथ देशज परिकल्पना करते हैं। डॉ विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि विभाजन 15 अगस्त 1947 को ही नहीं हुआ बल्कि उसके बाद भी जारी रहा धर्म के आधार पर बना राष्ट्र पाकिस्तान यदि असफल है तो धर्मनिरपेक्ष भारत भी असफलता की राह पर है राही ने अपने गांव गंगौली को कभी आदर्श गांव नहीं दिखाया उन्होंने उसे लड़ते हुए, जूझते हुए और विभाजित होते हुए दिखाया डॉ नीरज खरे ने कहा कि राही जी को किसी एक भाषा धर्म समाज क्षेत्र में बांधकर नहीं समझा जा सकता उनके चर्चित उपन्यास ‘आधा गांव’ में ग्रामीण सामंती समाज व जमींदारी का विघटन व्यवस्था में अन्याय व अत्याचार का वर्णन है इस उपन्यास में वर्गीय और जातीय विषमता का भी वर्णन है फरजाना मेहंदी ने कहा कि राही सांप्रदायिक दंगों से टूटे संवेदनशील कथाकार हैं। समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि राही मासूम रजा ने अपनी लेखनी में समाज के विघटन और उसकी टूटन को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ दिखाने की कोशिश की है जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह ने कहा कि राही मासूम रजा जितना प्रेम अपने गांव गंगौली से करते हैं उतना ही प्रेम अपने जिले गाजीपुर से भी करते हैं और अपने देश से भी इसीलिए राही मासूम रजा हमारे समय के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं स्वागत वक्तव्य देते हुए राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ के संस्थापक डॉ जयप्रकाश धूमकेतु ने कहा कि राही मासूम रज़ा का व्यक्तित्व बहुत विशाल है गंगौली के बहाने उन्होंने पूरे देश के सामाजिक ताने-बाने को टूटते हुए दिखाने की कोशिश की है हमें राही को कई दृष्टिकोणों से देखने पढ़ने और समझने की आवश्यकता है संगोष्ठी का संचालन के. के पाण्डेय और रामनरेश राम ने तथा आभार ओमप्रकाश सिंह ने किया अंत में कवि ऋतुराज और कॉमरेड स्वदेश भट्टाचार्य की याद में दो मिनट का मौन रख कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई इस अवसर पर राम अवतार सिंह अजीम खां मनोज सिंह अरविंद मूर्ति डॉ तेजभान डॉ रामशिरोमणि फखरे आलम डॉ धनंजय शर्मा संजय राय निसार अहमद देवेन्द्र मिश्र अजय मिश्र अब्दुल फहीम ख़ां सौम्या चतुर्वेदी प्रसेन ब्रिकेश यादव इरफान डॉ शकील अहमद डॉ एम शहाबुद्दीन सहित सैकड़ों बुद्धिजीवी और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।











